मेरे अरमानों को काश इतनी समझ हो 'वहशत',
कि वह उन आंखों से मुरव्वत का तकाजा न करें।
-'वहशत' कलकतवी
1.मुरव्वत - लिहाज, शील, संकोच, रिआयत 2. तकाजा - माँग
*****
लेदे के अपने पास फकत इक नजर तो है,
क्यों देखें जिन्दगी को, किसी की नजर से हम।
माना कि इस हमीं को न गुलजार कर सके,
कुछ खार कम तो कर गए गुजरे जिधर से हम।
1.गुलजार - (i) उद्यान, बाग (ii) वह स्थान जहाँ चहल-पहल और रौनक हो
*****
सफीना जब तेरे होते हुए भी डूब सकता है,
उठायें फिर तेरे एहसान क्यों ऐ नाखुदा कोई।
-फारिंग सीमाबी
1.सफीना - नाव, नौका 2.नाखुदा - मल्लाह, नाविक
*****
है अगर बेदर्दियाँ अपनों की दिल को नागवार,
नागवार उससे सिवा गैरों की हैं गमख्वारियाँ।
-ख्वाजा हाली
1.बेदर्दी - निर्दयता, बेरहमी 2.नागवार - जो पसन्द न हो,
जो अच्छी न लगे 3.सिवा - अधिक, जियादा
4. गमख्वारी - सहानुभूति, हमदर्दी, गमगुसारी
*****
न पूछो क्या गुजरती है, दिले-खुद्दार पर अक्सर,
किसी बेमेहर को जब मेहरबां कहना ही पड़ता है।
-जगन्नाथ आजाद
1.दिले-खुद्दार - स्वाभिमानी दिल
2. बेमेहर - (i) निष्ठुर, जिसमें ममता न हो (ii) निर्दयी, बेरहम
*****
परीशां हाल हैं लेकिन हमें है पासे-खुद्दारी,
हमारा सर किसी के आस्तां पर खम नहीं होता।
-शंकर जोधपुरी
1.पास - शील, संकोच, लिहाज 2.आस्तां -चौखट, दहलीज 3.खम - झुकना
*****
पेशे-अरबाबे-करम वह हाथ क्या फैलाता,
जिसको तिनके का भी एहसान गवारा न हुआ।
-साकिब लखनवी
1.पेशे-अरबाबे-करम - मेहरबानी या दया दिखाने वालों के सामने
*****
मुझको यह पासे-जब्त कि मुंह खोलना गुनाह,
उनकी यह आरजू कि इल्तिजा करे कोइ।
-हबीब अहमद सिद्दकी
1. पास - शील, संकोच, लिहाज 2. जब्त - सब्र
*****
जो नजर की इल्तिजा समझा नहीं,
हाथ उसके सामने फैलायें क्या?
-'शातिर' हाकिमी
1. इल्तिजा - प्रार्थना, दरख्वास्त
*****
तुझे यह नाज कि जन्नत की भीक मांगूगा,
मुझे यह जिद् कि तकाजा मेरा उसूल नहीं।
-मंजूर अहमद मंजूर
1.तकाजा - मांग, दिये हुए रूपये या वस्तु की मांग (ii) आवश्यकता, जरूरत (iii) किसी काम के लिए किसी से बराबर कहना
*****
दर्द मन्नतकशे-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।
जम्अ करते हो क्यों रकीबों को,
इक तमाशा हुआ, गिला न हुआ।
-मिर्जा 'गालिब'
1.मन्नतकशे-दवा - दवा के लिए प्रार्थना या मिन्नत करना
2.रकीब- किसी स्त्री से प्रेम करने वाले दो व्यक्ति
परस्पर रकीब होते हैं, प्रतिद्वंद्वी
*****
दिल रहे या न रहे, जख्म भरें या न भरें,
चारासाजों की खुशामद मुझे पसंद नहीं।
-नातिक लखनवी
1.चारासाजों - चिकित्कों
*****
अलग हम सबसे रहते हैं मिसाले तारे - तंबूरा,
जरा छेड़े से मिलते हैं मिला ले जिसका जी चाहे।
1.मिसाले - सम्मान
*****
एक तुम हो कि वफा तुमसे न होगी, न हुई,
एक हम कि तकाजा न किया है, न करेंगे।
-हसरत मोहानी
1.वफा - मित्र के साथ तन,मन और धन से निबाहना,
वफादारी, निबाह, निर्वाह
2.तकाजा - माँग, किसी काम के लिए किसी से बराबर कहना
*****
खाली है मेरा सागर तो सही, साकी को इशारा कौन करे,
खुद्दारिये-साइल भी कुछ है, हर बार तकाजा कौन करे।
-आनन्द नारायण मुल्ला
1.सागर - शराब का पिलाया, पानपात्र 2. खुद्दारिये-साइल - (i) मांगने वाला, भिक्षुक (ii) प्रार्थी, दरख्वास्त करने वाला 3.तकाजा - माँग, दिए हुए रूपए या वस्तु की मांग, किसी काम के लिए किसी से बराबर कहना
*****
छोड़ दीजे मुझको मेरे हाल पर,
जो गुजरती है गुजर ही जायेगी।
-असर लखनवी
*****
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Saturday, November 27, 2010
Thursday, November 25, 2010
Desh Ratna's Collection -- Sher-o-Shayari - कश्ती-और-तूफ़ान
अगर ऐ नाखुदा तूफान से लड़ने का दमखम है,
इधर कश्ती को मत लाना, इधर पानी बहुत कम है।
1.नाखुदा - मल्लाह, केवट, नाविक, कर्णधार
2. दमखम - शक्ति, हिम्मत, उत्साह, उमंग, हौसला
*****
उम्मीदी-नाउम्मेदी का वहम होना वही जाने,
कि जिसने कश्तियों को डूबते देखा हो साहिल पर।
साहिल-किनारा।
*****
कनारों से मुझे ऐ नाखुदा तुम दूर ही रखना,
तहाँ लेकर चलो तूफां जहाँ से उठने वाला है।
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
*****
कश्ती को भंवर में घिरने दो, मौजों के थपेड़े सहने दे,
जिन्दों में अगर जीना है तुम्हें, तूफान की हलचल रहने दे।
-सागर
*****
कहा था सबने, डूबेगी यह कश्ती,
मगर हम जानकर बैठे उसी में।
-खलीक बीकानेरी
*****
किश्ती को तूफान से बचाना तो सहज है,
तूफान के वकार का दिल टूट जायेगा।
-नरेश कुमार 'शाद'
1.वकार - प्रतिष्ठा, इज्जत
*****
खेलना जब उनको तूफानों से आता ही न था,
फिर वो कश्ती के हमारे, नाखुदा क्यों हो गये।
-'अफसर' मेरठी
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, केवट, कर्णधार
*****
खोला है किसने अपने सफीने का बादबां,
तूफां सिमट गये हैं कनारों की गोद में।
1. सफीना - नाव, नौका, कश्ती
2.बादबां - पोतपट, मरूतपट, जहाज में
लगाया जाने वाला पर्दा, जिसमें हवा भरने से जहाज चलता है।
*****
जब कश्ती साबितो-सालिम थी, साहिल की तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर, साहिल की तमन्ना कौन करे।
-मुइन अहसन 'जज्बी'
1. साबितो-सालिम - ठीकठाक 2. साहिल - किनारा, तट
3. शिकस्ता - टूटी हुई
*****
जरा थमे जो यह तूफां तो हो कुछ अन्दाजा,
कहाँ हूँ मैं कहाँ कश्ती, कहाँ किनारा है।
*****
तूफाँ बड़े गरूर से ललकारता रहा,
कश्ती बड़ी नियाज से जिद पर अड़ी रही।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1. नियाज - निष्ठा
*****
तूफाँ से खेलना अगर इन्सान सीख ले,
मौजों से आप उभरें, किनारे नये-नये।
-'असर' लखनवी
*****
तूफान कर रहा था मेरे अज्म का तवाफ,
दुनिया समझ रही थी कश्ती भंवर में है।
1.अज्म - संकल्प, साहस, दृढ़, निश्चय
2.तवाफ - परिक्रमा, चक्कर काटना
*****
तौहीने - जिन्दगी है कनारे की जुस्तजू,
मझदार में सफीना - ए - हस्ती उतार दे।
फिर देख की उसका रंग निखरता है किस तरह
दोशीजए - खिजां को खिताबे – बहार दे।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.जुस्तजू - तलाश, खोज 2.हस्ती - जीवन नौका 3. दोशीजए-खिजां- पतझड़ रूपी युवती 4.खिताबे–बहार - बहार का नाम या बहार की संज्ञा
*****
धारे के मुआफिक बहना क्या, तौहीने-दस्तोबाजू है,
पर्रवर्दए-तूफाँ किश्ती को, धारे के मुखालिफ बहने दे।
सागर निजामी
1. मुआफिक - ओर 2. पर्रवर्दए-तूफाँ - तूफान में पले हुए या पली हुई
*****
पर्वर्द-ए-तूफां इन्सां को, कश्ती की नहीं हाजत,
मौजों के तलातुम में उनको, साहिल नजर आता है।
-जिगर मुरादाबादी
1.पर्वर्द-ए-तूफां - तूफान में पले हुए 2. हाजत - जरूरत, आवश्यकता
3. मौजों - लहरें 4. तलातुम - हलचल 5. साहिल - किनारा, तट
*****
भरोसा है खुदी पर, नाखुदा की इल्तिजाकैसी,
मेरी कश्ती ही साहिल है, मेरी कश्ती में साहिल है।
-दाग
1.खुदी - स्वयं 2. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
3. इल्तिजा - प्रार्थना, दरखास्त 4. साहिल - किनारा, तट
*****
मझदार में जब कश्ती पहूँची, कश्ती वालों पै क्या गुजरी,
यह तूफानों की बातें हैं, आसूदा-ए-साहिल क्या जाने।
-जगन्नाथ आजाद
1. आसूदा-ए-साहिल - किनारे पर रहकर संतोष करने वाले
*****
यूँ ही डूबोता रहा अगर किश्तियाँ सैलाब,
तो सतहे-आब पै चलना भी आ ही जायेगा।
1. सैलाब - बाढ़ 2. सतहे-आब - पानी की सतह
*****
मरने की दुआयें क्यों माँगू जीने की तमन्ना कौन करे,
ये दुनिया या वो दुनिया अब ख्वाहिशे-दुनिया कौन करे?
जब कश्ती साबितो-सालिम थी, साहिल की तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर, साहिल की तमन्ना कौन करें?
-मुईन अहसन जज्बी
1.साबितो-सालिम - ठीकठाक, सही हालत में
2.साहिल - किनारा, तट 3.शिकस्ता - टूटी हुई
*****
मैंने यूं कश्ती का रूख सू-ए-तूफां कर दिया,
साजगारे-दिल हवा-ए-दामने-साहिल न था।
-'अलम' मुजफ्फरनगरी
1.सू-ए-तूफां - तूफान की ओर 2. साजगारे-दिल - दिल के मुआफिक या अनुकूल, जो बात दिल को पसंद आ जाए
3. हवा-ए-दामने-साहिल - साहिल के आँचल की हवा
*****
इधर कश्ती को मत लाना, इधर पानी बहुत कम है।
1.नाखुदा - मल्लाह, केवट, नाविक, कर्णधार
2. दमखम - शक्ति, हिम्मत, उत्साह, उमंग, हौसला
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उम्मीदी-नाउम्मेदी का वहम होना वही जाने,
कि जिसने कश्तियों को डूबते देखा हो साहिल पर।
साहिल-किनारा।
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कनारों से मुझे ऐ नाखुदा तुम दूर ही रखना,
तहाँ लेकर चलो तूफां जहाँ से उठने वाला है।
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
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कश्ती को भंवर में घिरने दो, मौजों के थपेड़े सहने दे,
जिन्दों में अगर जीना है तुम्हें, तूफान की हलचल रहने दे।
-सागर
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कहा था सबने, डूबेगी यह कश्ती,
मगर हम जानकर बैठे उसी में।
-खलीक बीकानेरी
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किश्ती को तूफान से बचाना तो सहज है,
तूफान के वकार का दिल टूट जायेगा।
-नरेश कुमार 'शाद'
1.वकार - प्रतिष्ठा, इज्जत
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खेलना जब उनको तूफानों से आता ही न था,
फिर वो कश्ती के हमारे, नाखुदा क्यों हो गये।
-'अफसर' मेरठी
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, केवट, कर्णधार
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खोला है किसने अपने सफीने का बादबां,
तूफां सिमट गये हैं कनारों की गोद में।
1. सफीना - नाव, नौका, कश्ती
2.बादबां - पोतपट, मरूतपट, जहाज में
लगाया जाने वाला पर्दा, जिसमें हवा भरने से जहाज चलता है।
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जब कश्ती साबितो-सालिम थी, साहिल की तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर, साहिल की तमन्ना कौन करे।
-मुइन अहसन 'जज्बी'
1. साबितो-सालिम - ठीकठाक 2. साहिल - किनारा, तट
3. शिकस्ता - टूटी हुई
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जरा थमे जो यह तूफां तो हो कुछ अन्दाजा,
कहाँ हूँ मैं कहाँ कश्ती, कहाँ किनारा है।
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तूफाँ बड़े गरूर से ललकारता रहा,
कश्ती बड़ी नियाज से जिद पर अड़ी रही।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1. नियाज - निष्ठा
*****
तूफाँ से खेलना अगर इन्सान सीख ले,
मौजों से आप उभरें, किनारे नये-नये।
-'असर' लखनवी
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तूफान कर रहा था मेरे अज्म का तवाफ,
दुनिया समझ रही थी कश्ती भंवर में है।
1.अज्म - संकल्प, साहस, दृढ़, निश्चय
2.तवाफ - परिक्रमा, चक्कर काटना
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तौहीने - जिन्दगी है कनारे की जुस्तजू,
मझदार में सफीना - ए - हस्ती उतार दे।
फिर देख की उसका रंग निखरता है किस तरह
दोशीजए - खिजां को खिताबे – बहार दे।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.जुस्तजू - तलाश, खोज 2.हस्ती - जीवन नौका 3. दोशीजए-खिजां- पतझड़ रूपी युवती 4.खिताबे–बहार - बहार का नाम या बहार की संज्ञा
*****
धारे के मुआफिक बहना क्या, तौहीने-दस्तोबाजू है,
पर्रवर्दए-तूफाँ किश्ती को, धारे के मुखालिफ बहने दे।
सागर निजामी
1. मुआफिक - ओर 2. पर्रवर्दए-तूफाँ - तूफान में पले हुए या पली हुई
*****
पर्वर्द-ए-तूफां इन्सां को, कश्ती की नहीं हाजत,
मौजों के तलातुम में उनको, साहिल नजर आता है।
-जिगर मुरादाबादी
1.पर्वर्द-ए-तूफां - तूफान में पले हुए 2. हाजत - जरूरत, आवश्यकता
3. मौजों - लहरें 4. तलातुम - हलचल 5. साहिल - किनारा, तट
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भरोसा है खुदी पर, नाखुदा की इल्तिजाकैसी,
मेरी कश्ती ही साहिल है, मेरी कश्ती में साहिल है।
-दाग
1.खुदी - स्वयं 2. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
3. इल्तिजा - प्रार्थना, दरखास्त 4. साहिल - किनारा, तट
*****
मझदार में जब कश्ती पहूँची, कश्ती वालों पै क्या गुजरी,
यह तूफानों की बातें हैं, आसूदा-ए-साहिल क्या जाने।
-जगन्नाथ आजाद
1. आसूदा-ए-साहिल - किनारे पर रहकर संतोष करने वाले
*****
यूँ ही डूबोता रहा अगर किश्तियाँ सैलाब,
तो सतहे-आब पै चलना भी आ ही जायेगा।
1. सैलाब - बाढ़ 2. सतहे-आब - पानी की सतह
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मरने की दुआयें क्यों माँगू जीने की तमन्ना कौन करे,
ये दुनिया या वो दुनिया अब ख्वाहिशे-दुनिया कौन करे?
जब कश्ती साबितो-सालिम थी, साहिल की तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर, साहिल की तमन्ना कौन करें?
-मुईन अहसन जज्बी
1.साबितो-सालिम - ठीकठाक, सही हालत में
2.साहिल - किनारा, तट 3.शिकस्ता - टूटी हुई
*****
मैंने यूं कश्ती का रूख सू-ए-तूफां कर दिया,
साजगारे-दिल हवा-ए-दामने-साहिल न था।
-'अलम' मुजफ्फरनगरी
1.सू-ए-तूफां - तूफान की ओर 2. साजगारे-दिल - दिल के मुआफिक या अनुकूल, जो बात दिल को पसंद आ जाए
3. हवा-ए-दामने-साहिल - साहिल के आँचल की हवा
*****
Desh Ratna's Collection - Sher - नक़ाब
तेरे और उसके दरमियाँ, तेरी खुदी हिजाब है,
अपना निशान खोयेजा, उसका निशान पायेजा।
-अख्तर शीरानी
1.खुदी - अहंकार, घमंड, अहंभाव, यह भाव कि बस हमीं हम हैं,अभिमान 2.हिजाब - पर्दा
*****
नहीं है राज कोई राज दीदावर के लिये,
नकाब पर्दा नहीं शौक की नजर के लिये।
-आर्श मल्सियानी
1.दीदावर - जोहरी, पारखी, किसी चींज के गुण-दोष को
अच्छी तरह समझने वाला
*****
हिजाबे-जलवा की अहले-नजर परवा नहीं करते,
वह तो पर्दों में भी उनका रू-ए-जेबा देख लेते हैं।
-जोश मल्सियानी
1.हिजाबे-जलवा - बनाव-सिंगार पर घूँघट डालना
2. अहले-नजर - नजर वाले 3.रू-ए-जेबा - सुन्दर मुखड़ा या चेहरा
*****
जलवे की रोकथाम करेगा हिजाब क्या,
दरिया के आगे आबे-रवाँ की बिसात क्या?
-हसन बरेलवी
1.हिजाब - (i) आड़, पर्दा, ओट (ii) मुखावरण, बुर्का, पर्दा
2.आबे-रवाँ - तेजी से बहता पानी 3.बिसात - साहस, हिम्मत, सामर्थ्य
*****
नकाबे-रूख उलटने तक तो मुझको होश था लेकिन,
भरी महफिल मं उसके बाद क्या गुजरी खुदा जाने।
-सईद अहमद खां
1. नकाबे-रूख - मुखावरण ,मुखपट, पर्दा
*****
मुझको यह आरजू है वह उठाएं नकाब खुद,
उनकी यह इल्तिजा तकाजा करे कोई।
-मजाज
1.नकाब - घूँघट, मुखावरण, मुखपट 2.इल्तिजा - प्रार्थना, दरखास्त
3.तकाजा - माँग, फर्माइश
*****
वह बेनकाब कहीं बेनकाब होता है,
कि आफताब खुद अपना हिजाब होता है।
-'नातिक' लखनवी
1.आफताब - सूरज, सूर्य 2.हिजाब - (i) आड़, पर्दा, ओट (ii) लाज, शर्म
*****
हया बेहोश होकर गिर रही है,
किसी की बेहिजाबी तौबा-तौबा।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.हया - लज्जा, शर्म, व्रीड़ा 2.बेहिजाबी - घूँघट उठाना
3. तौबा-तौबा - किसी बुरे काम से बाज रहने की दृढ़ प्रतिज्ञा
*****
है देखने वालों को संभलने का इशारा,
थोड़ी-सी नकाब वह सरकाये हुए हैं।
-अर्श मल्सियानी
1. नकाब - घूँघट, मुखावरण, पर्दा, बुर्का
*****
यह शर्मगीं निगाह,यह तबस्सुम निकाब में,
क्या बेहिजबियाँ है, तुम्हारे हिजाब में।
-जकी
1.शर्मगीं - शर्म से झुकी हुई
2.तबस्सुम - मुस्कान, मुस्कराहट, स्मित, मंदहास
3.निकाब - (i) घूँघट, मुखावरण, मुखापट (ii) ओट, आड़
4.बेहिजबियाँ - घूँघट हटा देना 5. हिजाब - आड़, पर्दा, ओट
*****
नकाब कहती है मैं पर्दा-ए-कयामत हूँ,
अगर यकीं न हो तो देख लो उठा के मुझे।
-'जलील' मानिकपुरी
1.नकाब - मुखवरण, मुखपट, पर्दा, बुर्का
*****
नकाब उनके चेहरे का सरका है शायद,
बड़ी दूर तक बर्क लहरा नहीं है।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.बर्क - बिजली, सौदामिनी, , तड़ित, चंचला
*****
फैला है हुस्ने-आरिजे-रौशन नकाब में,
क्या-क्या तड़प रही है तजल्ली हिजाब में।
-साकिब लखनवी
1.हुस्ने-आरिजे-रौशन - उज्जवल गाल का सौन्दर्य 2. नकाब - घूँघट, मुखावरण, मुखपट, बुर्का 3.तजल्ली - प्रकाश, आभा, नूर
*****
बताइए रहेगी शम्अ किस तरह हिजाब में,
यह क्या समझ के हुस्न को छुपाया है निकाब में।
-'साकिब' लखनवी
1.हिजाब - (i)आड़, पर्दा, ओट (ii) लज्जा , लाज, शर्म
2. निकाब - मुखावरण, मुखपट, बुर्का, घूँघट, ओट, आड़
*****
उठा सके आदमी तो पहले नजर से अपनी नकाब उठाए,
जमाने भर की तजल्लियों से नकाब उल्टी हुई मिलेगी।
-नवाब झांसवी
1.नकाब - पर्दा, घूँघट, ओट, आड़ 2.तजल्लियों - (i) आभा, प्रकाश, नूर, रौशनी (ii) प्रताप, जलाल (iii) अध्यात्मज्योति, नूरे-हक
*****
एक से लगते हैं सब ही कौन अपना, कौन गैर,
बेनकाब आये कोई तो, हम दरे -दिल वा करें।
-खलील
1.दरे–दिल - दिल का दरवाजा 2. वा - खोलना
*****
अपना निशान खोयेजा, उसका निशान पायेजा।
-अख्तर शीरानी
1.खुदी - अहंकार, घमंड, अहंभाव, यह भाव कि बस हमीं हम हैं,अभिमान 2.हिजाब - पर्दा
*****
नहीं है राज कोई राज दीदावर के लिये,
नकाब पर्दा नहीं शौक की नजर के लिये।
-आर्श मल्सियानी
1.दीदावर - जोहरी, पारखी, किसी चींज के गुण-दोष को
अच्छी तरह समझने वाला
*****
हिजाबे-जलवा की अहले-नजर परवा नहीं करते,
वह तो पर्दों में भी उनका रू-ए-जेबा देख लेते हैं।
-जोश मल्सियानी
1.हिजाबे-जलवा - बनाव-सिंगार पर घूँघट डालना
2. अहले-नजर - नजर वाले 3.रू-ए-जेबा - सुन्दर मुखड़ा या चेहरा
*****
जलवे की रोकथाम करेगा हिजाब क्या,
दरिया के आगे आबे-रवाँ की बिसात क्या?
-हसन बरेलवी
1.हिजाब - (i) आड़, पर्दा, ओट (ii) मुखावरण, बुर्का, पर्दा
2.आबे-रवाँ - तेजी से बहता पानी 3.बिसात - साहस, हिम्मत, सामर्थ्य
*****
नकाबे-रूख उलटने तक तो मुझको होश था लेकिन,
भरी महफिल मं उसके बाद क्या गुजरी खुदा जाने।
-सईद अहमद खां
1. नकाबे-रूख - मुखावरण ,मुखपट, पर्दा
*****
मुझको यह आरजू है वह उठाएं नकाब खुद,
उनकी यह इल्तिजा तकाजा करे कोई।
-मजाज
1.नकाब - घूँघट, मुखावरण, मुखपट 2.इल्तिजा - प्रार्थना, दरखास्त
3.तकाजा - माँग, फर्माइश
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वह बेनकाब कहीं बेनकाब होता है,
कि आफताब खुद अपना हिजाब होता है।
-'नातिक' लखनवी
1.आफताब - सूरज, सूर्य 2.हिजाब - (i) आड़, पर्दा, ओट (ii) लाज, शर्म
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हया बेहोश होकर गिर रही है,
किसी की बेहिजाबी तौबा-तौबा।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.हया - लज्जा, शर्म, व्रीड़ा 2.बेहिजाबी - घूँघट उठाना
3. तौबा-तौबा - किसी बुरे काम से बाज रहने की दृढ़ प्रतिज्ञा
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है देखने वालों को संभलने का इशारा,
थोड़ी-सी नकाब वह सरकाये हुए हैं।
-अर्श मल्सियानी
1. नकाब - घूँघट, मुखावरण, पर्दा, बुर्का
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यह शर्मगीं निगाह,यह तबस्सुम निकाब में,
क्या बेहिजबियाँ है, तुम्हारे हिजाब में।
-जकी
1.शर्मगीं - शर्म से झुकी हुई
2.तबस्सुम - मुस्कान, मुस्कराहट, स्मित, मंदहास
3.निकाब - (i) घूँघट, मुखावरण, मुखापट (ii) ओट, आड़
4.बेहिजबियाँ - घूँघट हटा देना 5. हिजाब - आड़, पर्दा, ओट
*****
नकाब कहती है मैं पर्दा-ए-कयामत हूँ,
अगर यकीं न हो तो देख लो उठा के मुझे।
-'जलील' मानिकपुरी
1.नकाब - मुखवरण, मुखपट, पर्दा, बुर्का
*****
नकाब उनके चेहरे का सरका है शायद,
बड़ी दूर तक बर्क लहरा नहीं है।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.बर्क - बिजली, सौदामिनी, , तड़ित, चंचला
*****
फैला है हुस्ने-आरिजे-रौशन नकाब में,
क्या-क्या तड़प रही है तजल्ली हिजाब में।
-साकिब लखनवी
1.हुस्ने-आरिजे-रौशन - उज्जवल गाल का सौन्दर्य 2. नकाब - घूँघट, मुखावरण, मुखपट, बुर्का 3.तजल्ली - प्रकाश, आभा, नूर
*****
बताइए रहेगी शम्अ किस तरह हिजाब में,
यह क्या समझ के हुस्न को छुपाया है निकाब में।
-'साकिब' लखनवी
1.हिजाब - (i)आड़, पर्दा, ओट (ii) लज्जा , लाज, शर्म
2. निकाब - मुखावरण, मुखपट, बुर्का, घूँघट, ओट, आड़
*****
उठा सके आदमी तो पहले नजर से अपनी नकाब उठाए,
जमाने भर की तजल्लियों से नकाब उल्टी हुई मिलेगी।
-नवाब झांसवी
1.नकाब - पर्दा, घूँघट, ओट, आड़ 2.तजल्लियों - (i) आभा, प्रकाश, नूर, रौशनी (ii) प्रताप, जलाल (iii) अध्यात्मज्योति, नूरे-हक
*****
एक से लगते हैं सब ही कौन अपना, कौन गैर,
बेनकाब आये कोई तो, हम दरे -दिल वा करें।
-खलील
1.दरे–दिल - दिल का दरवाजा 2. वा - खोलना
*****
Desh Ratna's Collection - Sher "ख़ुदा "
अपना तो आशिकी का किस्सा-ए-मुख्तसर है,
हम जा मिले खुदा से दिलबर बदल-बदल कर।
1.मुख्तसर - संक्षिप्त कहानी
*****
अब तो चलते हैं बुतकदे से ऐ 'मीर',
फिर मिलेंगे गर खुदा लाया।
-मीरतकी मीर
*****
आदम को मत खुदा कहो, आदम खुदा नही,
लेकिन खुदा के नूर से, आदम जुदा नहीं।
*****
आशिकी से मिलेगा खुदा,
बंदगी से खुदा नहीं मिलता।
-दाग
इक नहीं मांगी खुदा से आदमीयत की रविश,
और हर शै के लिए बंदे दुआ करते रहे।
1. रविश- शैली, तर्ज, आचार-व्यवहार
*****
इन्सान की बदबख्ती अन्दाज से बाहर है,
कमबख्त खुदा होकर भी बंदा नजर आता है।
1.बदबख्ती - बदनसीबी, बदकिस्मती
2.कमबख्त - अभागा, भाग्य का मारा, वदकिस्मत
*****
इलाही कैसे होते है जिन्हें है बंदगी की ख्वाहिश,
हमें तो शर्म दामनगीर होती है खुदा होते हुए।
-मीरतकी मीर
*****
कह दे ये कोई जाकर दुनिया के बागबाँ से ,
गुल मुतमइन नहीं हैं, तरतीबे-गुलिस्ताँ से।
-एहसन दानिश
*****
कहने को यूँ जहाँ में हजारों हैं यार-दोस्त
मुश्किल के वक्त एक है, परवरदिगार दोस्त।
-असीर
*****
कुछ लोगों से जब तक मुलाकात न हुई थी
मैं भी यह समझा था, खुदा सबसे बड़ा है।
*****
खिरदमंदों से क्या पुछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तिहा क्या है,
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
-मोहम्मद इकबाल
1.खिरदमंद - बुद्धिमान, अक्लमंद 2.इब्तिदा - प्रारम्भ, आरम्भ, शुरूआत 3. इन्तिहा - अंत, आखिरी हद या छोर 4. रजा - इच्छा, तमन्ना, ख्वाहिश
*****
खुदा तौफीक देता है उन्हें जो यह समझते हैं,
कि खुद अपने ही हाथों से बना करती हैं तकदीरें।
-'अफसर' मेरठी
1.तौफीक - (i) दैव योग से ऐसे कारण पैदा हो जाना जिससे अभिलषित वस्तु की प्राप्ति में सुगमता हो, ईश्वर की कृपा, दैवानुग्रह (ii) सामर्थ्य, शक्ति (iii) योग्यता, पात्रता, अहलियत
*****
खुदा और नाखुदा मिलकर डुबो दें यह तो मुमकिन है,
मेरी वजहे-तबाही सिर्फ तूफां हो नहीं सकता।
-सीमाब अकबराबादी
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, केवट, कर्णधार
*****
खुदा तो इक तरफ, खुद से भी कोसों दूर होता है,
बशर जिस वक्त ताकत के नशे में चूर होता है।
1. बशर - मानव, आदमी, मनुष्य
*****
खुदा या नाखुदा अब जिसको चाहो बख्श दो इज्जत,
हकीकत में तो कश्ती इत्तिफाकन बच गई अपनी।
-गोपाल मित्तल
1. कश्ती - नौका, नाव
*****
खुदाबंदा मेरी गुमराहियों पर दरगुजर फरमां,
मै उस माहौल में रहता हूँ जिसका नाम दुनिया है।
-'अकबर' हैदरी
1. खुदाबंदा -. हे ईश्वर, हे खुदा 2. गुमराहियों-. गलतियों, गुनाहों, रास्ता भूलना 3. दरगुजर - दोष देखकर उसे अनदेखा कर देना, चश्मपोशी
*****
खुदी की इब्तिदा यह थी कि अपने आप में गुम थे,
खूदी की इन्तिहा ये है कि खुदा को याद करता हूँ।
1.खुदी - यह भाव कि बस हमीं हम है, अहंकार, गर्व, घमंड
2.इब्तिदा - शुरूआत, आरम्भ
*****
खुलूसे-दिल से हो सिज्दे तो उन सिज्दों का क्या कहना,
सरक आया वहीं काबा, जहां हमने जबीं रख दी।
1.खुलूसे-दिल - सच्चे दिल से, निष्कपट दिल से 2. काबा - मक्के की एक इमारत जिसे मुसलमान ईश्वर का घर मानते हैं 3. जबीं - माथा, भाल
*****
छोड़ा नहीं खुदी को, दौड़े खुदा के पीछे,
आसां को छोड़ बंदे, मुश्किल को ढूंढ़ते हैं।
1.खुदी - अहंकार, अभिमान, यह भाव कि हमीं हम है
*****
'जफर' आदमी उसको न जानिएगा,
हों वो कैसा ही साहिबे-फहमो-जका।
जिसे ऐश में यादे - खुदा न रहा,
जिसे तैश में खौफे - खुदा न रहा।
-'जफर'
1.साहिबे-फहमो-जका - समझ-बूझ वाला, विवेकशील, समझदार
2. ऐश - भोग-विलास, खाने-पीने का आनन्द, विषयवासना
3.तैश - क्रोध, कोप, गुस्सा
*****
जहाँ सिज्दे को मन आया वहीं पर लिया सिज्दा,
न कोई संगे - दर अपना न कोई आस्तां अपना।
1.सिज्दा - ईश्वर के लिए सर झुकाना, नमाज में जमीन पर सर रखना
2संगे–दर - चौखट 3. आस्तां - दहलीज, ड्योढ़ी, चौखट.
*****
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता दे जहां पर खुदा नहीं।
1.जाहिद - संयम, नियम और जप-तप करने वाला व्यक्ति
*****
जिन्दगीअपनी जब इस शक्ल से गुजरी 'गालिब',
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे।
-मिर्जा 'गालिब'
*****
तिफ्ल-ए-शीरख्वार को ज्यों-ज्यों शऊर हो चला,
जितना खुदा के पास था, उतना ही दूर हो चला।
1.शीरख्वार - दूध मुंहा बच्चा
2.शऊर - (i) विवेक, समझ, अच्छे-बुरे की पहचान
(ii) सभ्यता, तमीज (iii) शिष्टता, सलीका
*****
तेरा करम तो आम है दुनिया के वास्ते,
मैं कितना ले सका, मुकद्दर की बात है।
1. करम - कृपा, मेहरबानी
*****
दावर के सामने बुते-काफिर को क्या कहें,
दोनों की शक्ल एक है, किसको खुदा कहूँ
मारो भी तुम, जिलाओ भी तुम तुमको क्या कहूँ,
तुमको खुदा कहूँ या खुदा को खुदा कहूँ।
-रियाज खैराबादी
1. दावर – ईश्वर 2.बुते-काफिर - बेहद हसीन औरत
*****
बंदे न होंगे जितने खुदा हैं खुदाई में,
किस-किस खुदा के सामने सिज्दा करे कोई।
*****
यही हुस्नो-इश्क का राज है कोई राज इसके सिवा नहीं
जो खुदा नहीं तो खुदी नही, जो खुदी नहीं तो खुदा नहीं।
-जिगर मुरादाबादी
1.खुदी - (i) यह भाव की हम है (ii) अहंकार, अभिमान, घमंड
*****
रकीबों ने रपट लिखवाई है यह जा के थाने में,
कि 'अकबर' नाम लेता है खुदा का इस जमाने में।
-अकबर इलाहाबादी
1.रकीबों - प्रतिद्वंदियों, एक स्त्री से प्रेम करने वाले दो व्यक्ति परस्पर रकीब होते हैं।
*****
रिन्दाने-जहां से ये नफरत, ऐ हजरते-वाइज क्या कहना,
अल्लाह के आगे बस न चला, बंदों से बगावत कर बैठे।
-फैज अहमद 'फैज'
1.रिन्दाने-जहां - मैकशी की दुनिया यानी शराब पीने वाले
2.हजरते-वाइज - धर्मोपदेशक महोदय
*****
सिज्दे करते भी हैं इंसां खुद दरे-इंसां पै रोज,
और फिर कहते भी है, बंदा खुदा होता नहीं।
-अर्श मल्सियानी
*****
हम खुदा थे गर न होता दिल में कोई मुद्दआ,
आरजूओं ने हमारी हमको बंदा कर दिया।
1.मुद्दआ - (i) स्वार्थ, गरज (ii) मतलब, आशय (iii) उद्देश्य, मंशा
*****
हर जर्रा चमकता है, अनवारे – इलाही से,
हर सांस यह कहती है, हम हैं तो खुदा भी है।
-अकबर इलाहाबादी
1. अनवार - प्रकाशपुंज, जगमगाहट, रोशनियां('नूर’ का बहुबचन)
2. इलाही - ईश्वर, खुदा, मेरा ईश्वर, मेरा खुदा
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हम जा मिले खुदा से दिलबर बदल-बदल कर।
1.मुख्तसर - संक्षिप्त कहानी
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अब तो चलते हैं बुतकदे से ऐ 'मीर',
फिर मिलेंगे गर खुदा लाया।
-मीरतकी मीर
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आदम को मत खुदा कहो, आदम खुदा नही,
लेकिन खुदा के नूर से, आदम जुदा नहीं।
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आशिकी से मिलेगा खुदा,
बंदगी से खुदा नहीं मिलता।
-दाग
इक नहीं मांगी खुदा से आदमीयत की रविश,
और हर शै के लिए बंदे दुआ करते रहे।
1. रविश- शैली, तर्ज, आचार-व्यवहार
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इन्सान की बदबख्ती अन्दाज से बाहर है,
कमबख्त खुदा होकर भी बंदा नजर आता है।
1.बदबख्ती - बदनसीबी, बदकिस्मती
2.कमबख्त - अभागा, भाग्य का मारा, वदकिस्मत
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इलाही कैसे होते है जिन्हें है बंदगी की ख्वाहिश,
हमें तो शर्म दामनगीर होती है खुदा होते हुए।
-मीरतकी मीर
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कह दे ये कोई जाकर दुनिया के बागबाँ से ,
गुल मुतमइन नहीं हैं, तरतीबे-गुलिस्ताँ से।
-एहसन दानिश
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कहने को यूँ जहाँ में हजारों हैं यार-दोस्त
मुश्किल के वक्त एक है, परवरदिगार दोस्त।
-असीर
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कुछ लोगों से जब तक मुलाकात न हुई थी
मैं भी यह समझा था, खुदा सबसे बड़ा है।
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खिरदमंदों से क्या पुछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तिहा क्या है,
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
-मोहम्मद इकबाल
1.खिरदमंद - बुद्धिमान, अक्लमंद 2.इब्तिदा - प्रारम्भ, आरम्भ, शुरूआत 3. इन्तिहा - अंत, आखिरी हद या छोर 4. रजा - इच्छा, तमन्ना, ख्वाहिश
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खुदा तौफीक देता है उन्हें जो यह समझते हैं,
कि खुद अपने ही हाथों से बना करती हैं तकदीरें।
-'अफसर' मेरठी
1.तौफीक - (i) दैव योग से ऐसे कारण पैदा हो जाना जिससे अभिलषित वस्तु की प्राप्ति में सुगमता हो, ईश्वर की कृपा, दैवानुग्रह (ii) सामर्थ्य, शक्ति (iii) योग्यता, पात्रता, अहलियत
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खुदा और नाखुदा मिलकर डुबो दें यह तो मुमकिन है,
मेरी वजहे-तबाही सिर्फ तूफां हो नहीं सकता।
-सीमाब अकबराबादी
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, केवट, कर्णधार
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खुदा तो इक तरफ, खुद से भी कोसों दूर होता है,
बशर जिस वक्त ताकत के नशे में चूर होता है।
1. बशर - मानव, आदमी, मनुष्य
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खुदा या नाखुदा अब जिसको चाहो बख्श दो इज्जत,
हकीकत में तो कश्ती इत्तिफाकन बच गई अपनी।
-गोपाल मित्तल
1. कश्ती - नौका, नाव
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खुदाबंदा मेरी गुमराहियों पर दरगुजर फरमां,
मै उस माहौल में रहता हूँ जिसका नाम दुनिया है।
-'अकबर' हैदरी
1. खुदाबंदा -. हे ईश्वर, हे खुदा 2. गुमराहियों-. गलतियों, गुनाहों, रास्ता भूलना 3. दरगुजर - दोष देखकर उसे अनदेखा कर देना, चश्मपोशी
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खुदी की इब्तिदा यह थी कि अपने आप में गुम थे,
खूदी की इन्तिहा ये है कि खुदा को याद करता हूँ।
1.खुदी - यह भाव कि बस हमीं हम है, अहंकार, गर्व, घमंड
2.इब्तिदा - शुरूआत, आरम्भ
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खुलूसे-दिल से हो सिज्दे तो उन सिज्दों का क्या कहना,
सरक आया वहीं काबा, जहां हमने जबीं रख दी।
1.खुलूसे-दिल - सच्चे दिल से, निष्कपट दिल से 2. काबा - मक्के की एक इमारत जिसे मुसलमान ईश्वर का घर मानते हैं 3. जबीं - माथा, भाल
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छोड़ा नहीं खुदी को, दौड़े खुदा के पीछे,
आसां को छोड़ बंदे, मुश्किल को ढूंढ़ते हैं।
1.खुदी - अहंकार, अभिमान, यह भाव कि हमीं हम है
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'जफर' आदमी उसको न जानिएगा,
हों वो कैसा ही साहिबे-फहमो-जका।
जिसे ऐश में यादे - खुदा न रहा,
जिसे तैश में खौफे - खुदा न रहा।
-'जफर'
1.साहिबे-फहमो-जका - समझ-बूझ वाला, विवेकशील, समझदार
2. ऐश - भोग-विलास, खाने-पीने का आनन्द, विषयवासना
3.तैश - क्रोध, कोप, गुस्सा
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जहाँ सिज्दे को मन आया वहीं पर लिया सिज्दा,
न कोई संगे - दर अपना न कोई आस्तां अपना।
1.सिज्दा - ईश्वर के लिए सर झुकाना, नमाज में जमीन पर सर रखना
2संगे–दर - चौखट 3. आस्तां - दहलीज, ड्योढ़ी, चौखट.
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जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता दे जहां पर खुदा नहीं।
1.जाहिद - संयम, नियम और जप-तप करने वाला व्यक्ति
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जिन्दगीअपनी जब इस शक्ल से गुजरी 'गालिब',
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे।
-मिर्जा 'गालिब'
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तिफ्ल-ए-शीरख्वार को ज्यों-ज्यों शऊर हो चला,
जितना खुदा के पास था, उतना ही दूर हो चला।
1.शीरख्वार - दूध मुंहा बच्चा
2.शऊर - (i) विवेक, समझ, अच्छे-बुरे की पहचान
(ii) सभ्यता, तमीज (iii) शिष्टता, सलीका
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तेरा करम तो आम है दुनिया के वास्ते,
मैं कितना ले सका, मुकद्दर की बात है।
1. करम - कृपा, मेहरबानी
*****
दावर के सामने बुते-काफिर को क्या कहें,
दोनों की शक्ल एक है, किसको खुदा कहूँ
मारो भी तुम, जिलाओ भी तुम तुमको क्या कहूँ,
तुमको खुदा कहूँ या खुदा को खुदा कहूँ।
-रियाज खैराबादी
1. दावर – ईश्वर 2.बुते-काफिर - बेहद हसीन औरत
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बंदे न होंगे जितने खुदा हैं खुदाई में,
किस-किस खुदा के सामने सिज्दा करे कोई।
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यही हुस्नो-इश्क का राज है कोई राज इसके सिवा नहीं
जो खुदा नहीं तो खुदी नही, जो खुदी नहीं तो खुदा नहीं।
-जिगर मुरादाबादी
1.खुदी - (i) यह भाव की हम है (ii) अहंकार, अभिमान, घमंड
*****
रकीबों ने रपट लिखवाई है यह जा के थाने में,
कि 'अकबर' नाम लेता है खुदा का इस जमाने में।
-अकबर इलाहाबादी
1.रकीबों - प्रतिद्वंदियों, एक स्त्री से प्रेम करने वाले दो व्यक्ति परस्पर रकीब होते हैं।
*****
रिन्दाने-जहां से ये नफरत, ऐ हजरते-वाइज क्या कहना,
अल्लाह के आगे बस न चला, बंदों से बगावत कर बैठे।
-फैज अहमद 'फैज'
1.रिन्दाने-जहां - मैकशी की दुनिया यानी शराब पीने वाले
2.हजरते-वाइज - धर्मोपदेशक महोदय
*****
सिज्दे करते भी हैं इंसां खुद दरे-इंसां पै रोज,
और फिर कहते भी है, बंदा खुदा होता नहीं।
-अर्श मल्सियानी
*****
हम खुदा थे गर न होता दिल में कोई मुद्दआ,
आरजूओं ने हमारी हमको बंदा कर दिया।
1.मुद्दआ - (i) स्वार्थ, गरज (ii) मतलब, आशय (iii) उद्देश्य, मंशा
*****
हर जर्रा चमकता है, अनवारे – इलाही से,
हर सांस यह कहती है, हम हैं तो खुदा भी है।
-अकबर इलाहाबादी
1. अनवार - प्रकाशपुंज, जगमगाहट, रोशनियां('नूर’ का बहुबचन)
2. इलाही - ईश्वर, खुदा, मेरा ईश्वर, मेरा खुदा
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Desh Ratna's Collection of Munnawar rana Shayari "(बच्चे)"
(बच्चे)
फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बे में जो झाड़ू लगाते हैं
हुमकते खेलते बच्चों की शैतानी नहीं जाती
मगर फिर भी हमारे घर की वीरानी नहीं जाती
अपने मुस्तक़्बिल की चादर पर रफ़ू करते हुए
मस्जिदों में देखिये बच्चे वज़ू करते हुए
मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ
घर का बोझ उठाने वाले बच्चे की तक़दीर न पूछ
बचपन घर से बाहर निकला और खिलौना टूट गया
जो अश्क गूँगे थे वो अर्ज़े—हाल करने लगे
हमारे बच्चे हमीं पर सवाल करने ल्गे
जब एक वाक़्या बचपन का हमको याद आया
हम उन परिंदों को फिर से घरों में छोड़ आए
भरे शहरों में क़ुर्बानी का मौसम जबसे आया है
मेरे बच्चे कभी होली में पिचकारी नहीं लाते
मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे
इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा
भूख से बेहाल बच्चे तो नहीं रोये मगर
घर का चूल्हा मुफ़लिसी की चुग़लियाँ खाने लगा
तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठ्ठी
उस शख़्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था
रेत पर खेलते बच्चों को अभी क्या मालूम
कोई सैलाब घरौंदा नहीं रहने देता
धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है
मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है
हवा के रुख़ पे रहने दो ये जलना सीख जाएगा
कि बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जाएगा
इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ
सहमे—सहमे—से चराग़ों के उजाले की तरह
मैंने इक मुद्दत से मस्जिद नहीं देखी मगर
एक बच्चे का अज़ाँ देना बहुत अच्छा लगा
इन्हें अपनी ज़रूरत के ठिकाने याद रहते हैं
कहाँ पर है खिलौनों की दुकाँ बच्चे समझते हैं
ज़माना हो गया दंगे में इस घर को जले लेकिन
किसी बच्चे के रोने की सदाएँ रोज़ आती हैं
फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बे में जो झाड़ू लगाते हैं
हुमकते खेलते बच्चों की शैतानी नहीं जाती
मगर फिर भी हमारे घर की वीरानी नहीं जाती
अपने मुस्तक़्बिल की चादर पर रफ़ू करते हुए
मस्जिदों में देखिये बच्चे वज़ू करते हुए
मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ
घर का बोझ उठाने वाले बच्चे की तक़दीर न पूछ
बचपन घर से बाहर निकला और खिलौना टूट गया
जो अश्क गूँगे थे वो अर्ज़े—हाल करने लगे
हमारे बच्चे हमीं पर सवाल करने ल्गे
जब एक वाक़्या बचपन का हमको याद आया
हम उन परिंदों को फिर से घरों में छोड़ आए
भरे शहरों में क़ुर्बानी का मौसम जबसे आया है
मेरे बच्चे कभी होली में पिचकारी नहीं लाते
मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे
इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा
भूख से बेहाल बच्चे तो नहीं रोये मगर
घर का चूल्हा मुफ़लिसी की चुग़लियाँ खाने लगा
तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठ्ठी
उस शख़्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था
रेत पर खेलते बच्चों को अभी क्या मालूम
कोई सैलाब घरौंदा नहीं रहने देता
धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है
मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है
हवा के रुख़ पे रहने दो ये जलना सीख जाएगा
कि बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जाएगा
इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ
सहमे—सहमे—से चराग़ों के उजाले की तरह
मैंने इक मुद्दत से मस्जिद नहीं देखी मगर
एक बच्चे का अज़ाँ देना बहुत अच्छा लगा
इन्हें अपनी ज़रूरत के ठिकाने याद रहते हैं
कहाँ पर है खिलौनों की दुकाँ बच्चे समझते हैं
ज़माना हो गया दंगे में इस घर को जले लेकिन
किसी बच्चे के रोने की सदाएँ रोज़ आती हैं
Monday, October 25, 2010
बच्चे - shayari (Desh Ratna's Collection)
दौलत से मुहब्बत तो नहीं थी मुझे लेकिन
बच्चों ने खिलौनों की तरफ़ देख लिया था
जिस्म पर मेरे बहुत शफ़्फ़ाफ़ कपड़े थे मगर
धूल मिट्टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा
कम से बच्चों के होंठों की हँसी की ख़ातिर
ऐसे मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
क़सम देता है बच्चों की, बहाने से बुलाता है
धुआँ चिमनी का हमको कारख़ाने से बुलाता है
बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद
अब जाग भी जाते हैं तो सहरी नहीं खाते
इन्हें फ़िरक़ा परस्ती मत सिखा देना कि ये बच्चे
ज़मी से चूम कर तितली के टूटे पर उठाते हैं
सबके कहने से इरादा नहीं बदला जाता
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता
बिछड़ते वक़्त भी चेहरा नहीं उतरता है
यहाँ सरों से दुपट्टा नहीं उतरता है
कानों में कोई फूल भी हँस कर नहीं पहना
उसने भी बिछड़ कर कभी ज़ेवर नहीं पहना
मुझे बुलाता है मक़्तल मैं किस तरह जाऊँ
कि मेरी गोद से बच्चा नहीं उतरता है
शर्म आती है मज़दूरी बताते हुए हमको
इतने में तो बच्चों का ग़ुबारा नहीं मिलता
तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठ्ठी
उस शख़्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था
रेत पर खेलते बच्चों को अभी क्या मालूम
कोई सैलाब घरौंदा नहीं रहने देता
धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है
मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है
हवा के रुख़ पे रहने दो ये जलना सीख जाएगा
कि बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जाएगा
इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ
सहमे—सहमे—से चराग़ों के उजाले की तरह
मैंने इक मुद्दत से मस्जिद नहीं देखी मगर
एक बच्चे का अज़ाँ देना बहुत अच्छा लगा
इन्हें अपनी ज़रूरत के ठिकाने याद रहते हैं
कहाँ पर है खिलौनों की दुकाँ बच्चे समझते हैं
ज़माना हो गया दंगे में इस घर को जले लेकिन
किसी बच्चे के रोने की सदाएँ रोज़ आती हैं
फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बे में जो झाड़ू लगाते हैं
हुमकते खेलते बच्चों की शैतानी नहीं जाती
मगर फिर भी हमारे घर की वीरानी नहीं जाती
अपने मुस्तक़्बिल की चादर पर रफ़ू करते हुए
मस्जिदों में देखिये बच्चे वज़ू करते हुए
मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ
घर का बोझ उठाने वाले बच्चे की तक़दीर न पूछ
बचपन घर से बाहर निकला और खिलौना टूट गया
जो अश्क गूँगे थे वो अर्ज़े—हाल करने लगे
हमारे बच्चे हमीं पर सवाल करने ल्गे
जब एक वाक़्या बचपन का हमको याद आया
हम उन परिंदों को फिर से घरों में छोड़ आए
भरे शहरों में क़ुर्बानी का मौसम जबसे आया है
मेरे बच्चे कभी होली में पिचकारी नहीं लाते
मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे
इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा
भूख से बेहाल बच्चे तो नहीं रोये मगर
घर का चूल्हा मुफ़लिसी की चुग़लियाँ खाने लगा
बच्चों ने खिलौनों की तरफ़ देख लिया था
जिस्म पर मेरे बहुत शफ़्फ़ाफ़ कपड़े थे मगर
धूल मिट्टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा
कम से बच्चों के होंठों की हँसी की ख़ातिर
ऐसे मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
क़सम देता है बच्चों की, बहाने से बुलाता है
धुआँ चिमनी का हमको कारख़ाने से बुलाता है
बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद
अब जाग भी जाते हैं तो सहरी नहीं खाते
इन्हें फ़िरक़ा परस्ती मत सिखा देना कि ये बच्चे
ज़मी से चूम कर तितली के टूटे पर उठाते हैं
सबके कहने से इरादा नहीं बदला जाता
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता
बिछड़ते वक़्त भी चेहरा नहीं उतरता है
यहाँ सरों से दुपट्टा नहीं उतरता है
कानों में कोई फूल भी हँस कर नहीं पहना
उसने भी बिछड़ कर कभी ज़ेवर नहीं पहना
मुझे बुलाता है मक़्तल मैं किस तरह जाऊँ
कि मेरी गोद से बच्चा नहीं उतरता है
शर्म आती है मज़दूरी बताते हुए हमको
इतने में तो बच्चों का ग़ुबारा नहीं मिलता
तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठ्ठी
उस शख़्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था
रेत पर खेलते बच्चों को अभी क्या मालूम
कोई सैलाब घरौंदा नहीं रहने देता
धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है
मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है
हवा के रुख़ पे रहने दो ये जलना सीख जाएगा
कि बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जाएगा
इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ
सहमे—सहमे—से चराग़ों के उजाले की तरह
मैंने इक मुद्दत से मस्जिद नहीं देखी मगर
एक बच्चे का अज़ाँ देना बहुत अच्छा लगा
इन्हें अपनी ज़रूरत के ठिकाने याद रहते हैं
कहाँ पर है खिलौनों की दुकाँ बच्चे समझते हैं
ज़माना हो गया दंगे में इस घर को जले लेकिन
किसी बच्चे के रोने की सदाएँ रोज़ आती हैं
फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बे में जो झाड़ू लगाते हैं
हुमकते खेलते बच्चों की शैतानी नहीं जाती
मगर फिर भी हमारे घर की वीरानी नहीं जाती
अपने मुस्तक़्बिल की चादर पर रफ़ू करते हुए
मस्जिदों में देखिये बच्चे वज़ू करते हुए
मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ
घर का बोझ उठाने वाले बच्चे की तक़दीर न पूछ
बचपन घर से बाहर निकला और खिलौना टूट गया
जो अश्क गूँगे थे वो अर्ज़े—हाल करने लगे
हमारे बच्चे हमीं पर सवाल करने ल्गे
जब एक वाक़्या बचपन का हमको याद आया
हम उन परिंदों को फिर से घरों में छोड़ आए
भरे शहरों में क़ुर्बानी का मौसम जबसे आया है
मेरे बच्चे कभी होली में पिचकारी नहीं लाते
मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे
इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा
भूख से बेहाल बच्चे तो नहीं रोये मगर
घर का चूल्हा मुफ़लिसी की चुग़लियाँ खाने लगा
Friday, August 20, 2010
जिस दिन से चला हूँ कभी मुड़कर नही देखा
जिस दिन से चला हूँ कभी मुड़कर नही देखा
मैने कोई गुजरा हुआ मंज़र नही देखा
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहनेवाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नही देखा
बेवक़्त अगर जाओंगा सब चोक पड़ेंगे
एक उम्र हुई दिन में कभी घर नही देखा
यह फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मेरा काँटों भरा बिस्तर नही देखा
मैने कोई गुजरा हुआ मंज़र नही देखा
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहनेवाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नही देखा
बेवक़्त अगर जाओंगा सब चोक पड़ेंगे
एक उम्र हुई दिन में कभी घर नही देखा
यह फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मेरा काँटों भरा बिस्तर नही देखा
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